विभाग

संग्रहालय पांच विभागों में संगठित है :

  • कार्यकारिणी – नीति और रणनीति विकास तथा समग्र निगरानी
  • प्रशासन,वित्त तथा सुविधा प्रबंधन विभाग– नीति तथा व्यवस्था सलाहकार, लेखाप्रणाली, वेतन भुगतान, मानव संसाधन/लाभ प्रबंधन, कर्मचारी प्रशिक्षण, सुविधा प्रबंधन, रख-रखाव और सुरक्षा
  • प्रदर्शन और संग्रह विभाग– प्रदर्शन योजना तथा विकास,संग्रहों का उपोयग
  • शिक्षा एवं सार्वजनिक कार्यक्रम विभाग –सार्वजनिक तथा शैक्षणिक कार्यक्रम,पाठ्यक्रम योजना सहित
  • विपणन, राजस्व सृजन तथा दर्शक सेवा विभाग – विपणन रणनीति तथा पैकेजिंग अवसर, मीडिया क्रय, वेबसाइट प्रबंधन, दर्शक सेवाएं

 

 

संग्रह

  • बिहार संग्रहालय के संग्रहों में शामिल वस्तु (पत्थर एवं ताम्र मूर्तियां,लघुचित्र तथा थंग्कास), प्रागैतिहासिक वस्तुएं, मानवविज्ञान संबंधित कलाकृतियां तथा सामाजिक इतिहास से जुड़ीं वस्तुएं हैं।
  • बिहार संग्रहालय की स्थायी संग्रह दीर्घाओं के दो बुनियादी घटक हैं – इतिहास दीर्घा और कला दीर्घा।संग्रहालय की कलाकृतियां तथा प्रदर्शन की कलाकृतियां प्राचीन पाटलिपुत्र एवं 20वीं सदी से पहले के समय के बिहार की कहानी सुनाती हैं।
  • बिहार संग्रहालय में सूचीकरण तथा डिजीटलीकरण चल रही वह गतविधियां हैं,जो संग्रहों के उचित उपयोग,रिकॉर्ड्स तथा संरक्षण को सक्षम बनायेगी,अधिकृत कर्मचारियों की इनतक पहुंच होगी।
  • बिहार संग्रहालय राज्य के भीतर 1800 के पूर्व की पुरातात्विक उपलब्धियों का आधिकारिक भंडार है तथा भविष्य में होने वाले उल्लेखनीय पुरातात्विक अन्वेषणों को भी यहां भंडारित किया जाएगा।
  • संग्रहालय का उद्देश्य शोध आधारित गतिविधियों तथा स्थानीय,क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय संग्रहालयों तथा भंडारों के साथ संभावित साझेदारी के माध्यम से अपने संग्रह का विकास करना है।
  • संग्रहालय प्रदर्शित की जाने वाली वस्तुओं तथा अध्ययन एवं शोध के लिए लायी जाने वाली वस्तुओं के संग्रह का विकास करेगा, लेकिन संग्रह के लिए आ रही वस्तुओं को लेकर वह इतना चयनात्मक होगा ताकि संग्रह में उपयुक्त वस्तुओं को ही शामिल किया जा सके।

 

इतिहास

पटना अतीत की कहानियों से भरा हुआ एक शहर है तथा इसकी धरती ने कई शानदार सभ्यताओं के आगमन को देखा है। इस शहर का इतिहास धागे से बनी गेंद की तरह कई परतों को खोलता है,जो आपको कई खमोपेंच तथा मोड़ों के साथ चकित करता है,क्योंकि हमने दो सहस्राब्दियों से भी ज़्यादा की यात्रा की है। पटना संग्रहालय की स्थापना 1917 में हुई और इसी समय दीदारगंज यक्षी का आविष्कार हुआ। जो संग्रहालय में सबसे ज़्यादा चर्चित तथा देखे जाने वाली कलाकृति-विश्व प्रसिद्ध हुई, यादगार मौर्यकालीन दृष्टि वाली मूर्ति के साथ एक सौ साल पूरा करने की ओर है। वाह्य-स्थल के साथ संरचना और प्रस्तुतीकरण की पद्धति के हिसाब से पटना संग्रहालय की एक सीमा होने के कारण, बिहार राज्य में, एक नये संग्रहालय की आवश्यकता को बहुत गंभीरता के साथ महसूस किया गया। कला,संस्कृति एवं युवा विभाग (डीएसीवाई), बिहार सरकार द्वारा पटना संग्रहालय के पश्चिम स्थल में बेली रोड पर एक नये संग्रहालय की स्थापना को प्रस्तावित किया गया। अधिकांश बिहार वासियों के लिए सामान्यत: जादूघर के नाम से मशहूर पटना संग्रहालय में विख्यात कलाकृतियां तथा संग्रह हैं। इतिहास और कला से संबंधित बहुत सारी इन वस्तुओं को इस दृष्टिकोण से नये संग्रहालय में पुनर्स्थापित किया गया है ताकि इस पर ध्यान केन्द्रित किया जा सके कि भारत को संयुक्त रखने वाली एक उत्प्रेरक शक्ति वाले इस क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास का यशोगान किया जा सके। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, प्रतिस्पर्धात्मक बोली के आधार पर, विश्व के सबसे बड़े तथा अग्रणी फ़र्म, लॉर्ड कल्चरल रिसोर्सेज कंपनी को पटना में इस विश्व स्तरीय संग्रहालय की स्थापना के लिए अधिकृत किया गया।

मौजूदा पटना संग्रहालय नये संग्रहालय के लिए आरंभिक स्थल था तथा पटना संग्रहालय के व्यापक संग्रहों का सावधानी के साथ शोध एवं विश्लेषण किया गया। यह निर्णय लिया गया कि पहले से मौजूद संग्रहालय को प्राकृतिक इतिहास के विश्लेषण के रूप में इस तरह रखा जाए,जिस तरह पत्थर हो चुके पेड़ को ज़मीन में स्थापित करके रखा गया है। यह पेड़ पटना संग्रहालय के प्राकृतिक इतिहास का महत्व प्रतीक है। उपनिवेशवादी काल से पहले के बिहार के आधुनिक इतिहास का अन्वेषण करते हुए आज़ादी के संघर्ष के नायकत्व एवं बिहार की उपलब्धियों तथा स्वाधीनता के बाद के भारत को शामिल करने पर केन्द्रित पटना संग्रहालय में नये प्रदर्शन लगाये जाने का प्रस्ताव किया गया।।

नये बिहार संग्रहालय के लिए मार्गदर्शन मुख्यमंत्री तथा बिहार राज्य सरकार के वरिष्ठ स्तर के लोगों द्वारा उपलब्ध कराया गया। बिहार संग्रहालय मानव इतिहास पर केन्द्रित होगा। बिहार संग्रहालय की स्थायी संग्रह दीर्घा के दो बुनियादी घटक हैं – इतिहास दीर्घा तथा कला दीर्घा। यहां पूर्वावलकोन दीर्घा तथा विशेष प्रदर्शन दीर्घा भी हैं। मौजूदा पटना संग्रहालय से लाये गए संग्रहों के ज़रिये बिहार संग्रहालय प्राचीन काल की कलात्मक विरासत को प्रस्तुत करता है, जो विषयवस्तु के दृष्टिकोण से कला-कार्य हैं। जनजातीय कला, शिल्प कला और बिहार के विभिन्न क्षेत्रों की प्रदर्शन कला के लिए कुछ निर्धारित क्षेत्र हैं।

संग्रहालय की कल्पना करते हुए ख़ासकर बिहार के निवासियों की ज़रूरत, राज्य के लोगों के जुड़े होने के अहसास का सृजन तथा बच्चों और युवाओं के सीखने तथा उनकी प्रगति के लिए एक प्रेरक माहौल के निर्माण का ध्यान रखा गया है। यह दुनियाभर से लोगों को आकर्षित करता है और यह एक रोमांचकारी पर्यटनस्थल तथा सांस्कृतिक केन्द्र है। प्रदर्शित वस्तुएं और प्रदर्शनों को इस तरह बनाया गया है ताकि एक संवादमूलक माहौल बन सके तथा लोगों में इस क़दर उत्साह बने कि वो यहां बार-बार आयें।

बिहार संग्रहालय का वास्तुशिल्प

संग्रहालय भवन की रूपरेखा और संरचना निर्माण लिए, विश्वविख्यात वास्तुशिल्प से संबंधित कंपनियों को अपने-अपने प्रस्ताव को प्रस्तुत करने के लिए आमंत्रित किया गया तथा प्रतियोगिता के आधार पर चयन किया गया। जापानी कंपनी, माकी एण्ड असोसिएट्स ने विजेता प्रस्ताव दिया, जिसने प्रस्ताव रखा कि वो एक मुंबई की कंपनी ओपोलिस आर्किटेक्ट्स के साथ अपनी योजना को लागू करेगी। 10 साल तक अमेरिका में कंपनी के स्थापक फ़ूमिहीक माकी द्वारा अपनी सेवा देने के बाद माकी एण्ड असोसिएट्स की स्थापना 1965 में की गई। उन्हें बहुत सारे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ा गया है। बिहार संग्रहालय के लिए माकी ने एक संकल्पना की रूरेखा बनायी, जिसकी अवधारणा ने संवेदनशील अनुभव को आकर्षित किया, क्योंकि यह व्यावहारिक दृष्टिकोण के हिसाब से बिल्कुल सटीक बैठती थी और प्रतिष्ठान के भविष्य में होने वाले विकास को देखते हुए इसमें प्रावधानों की पूरी गुंजाइश थी। वास्तुकारों ने संग्रहालय की कल्पना कुछ इस तरह से की, मानों अलग-अलग लेंसों के माध्यम से चार पार्श्वों को इसे देखा जा रहा हो।

डिज़ाइन का लक्ष्य निम्नलिखित कारकों का सृजन करना था:

  • विस्तार के रूप में संग्रहालय – एक ऐसा संग्रहालय, जो बिहार के इतिहास के विभिन्न स्तरों को प्रतिबिंबित करता हो।
  • यात्रा के रूप में संग्रहालय – एक ऐसा संग्रहालय, जो स्मृतियों तथा बिहार क्षेत्र के महाकाव्यात्मक गुंजाइश को प्रतिबिंबित करता हो।
  • ञान परिदृश्य के रूप मे संग्रहालय – एक ऐसा संग्रहालय, जो बिहार की शैक्षणिक आवश्यकता को प्रतिबिंबित करता हो।
  • प्रतीक के रूप में संग्रहालय – एक ऐसा संग्रहालय, जो भारत के अतीत और भविष्य दोनों को प्रतिबिंबित करता हो।

एक भवन के अपने तल क्षेत्र तक संकुचित रहने के कारण माकी एण्ड असोसिएट्स ने विस्तारित योजना का फ़ायदा उठाते हुए भवन का विस्तार किया गया तथा आस-पास के परिदृश्य को सौहार्द्रपूर्ण तरीक़े से इसके साथ एकीकृत कर दिया। इससे डिज़ाइन में आँगन और छतों के इस्तेमाल की भी संभावना बनी, समेकित रूप से बाहरी क्षेत्रों के साथ आंतरिक क्षेत्र का विकल्प भी खुला। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि निर्मित क्षेत्रों की यात्रा करते हुए दर्शक इतिहास की खोज कर पायें, वास्तुकार ने जापानी ‘ओकू’ संकल्पना को लागू किया, जिससे इस स्थान के कई स्तरों का उपयोग संभव हो सके। दर्शकों जैसे ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाता है, ओकू आशा और चिंतन के बोध को सृजित करता है। इस तरह, माकी एण्ड असोसिएट्स ने एक सुखद तथा लुभावने अनुभव का सृजन किया, जहां उनके विशेषज्ञों तथा संवेदनशील वास्तुशिल्प द्वारा अतीत की कहानियों को और बेहदर बना दिया गया है। आप हमेशा इस संग्रहालय की यात्रा करते हैं, और जितनी बार आप ऐसा करते हैं, हर बार आपको एक नया अनुभव होता है। बाहरी दुनियां की भीड़ से हटकर आपको अतीत की गहराई में डूबकी लगाने का मौक़ा देते हुए समय इस क्षेत्र विस्तार के भीतर स्वयं को धीमा कर देता है।

बिहार की समृतियों के “विहार” के ज़रिये एक यात्रा के विचार के आधार पर तरह-तरह के क्षेत्र आपके सामने खुलते हैं, और ये क्षेत्र हैं: विशाल एवं अंतरंग, खुला एवं बंद, आंतरिक क्षेत्र और वाह्य क्षेत्र। इस “वृहत् अनुभव” से इसका वास्तुशिल्प आपको “सूक्ष्म अनुभव” पाने की सहूलियत देता है, जिससे आपका ध्यान प्रदर्शित वस्तुओं पर केन्द्रित हो जाता है। प्रदर्शनी स्थलों के बीच वैषम्य पैदा करके, वास्तुशिल्प देखने के अनुभव की एकरसता को तोड़ता है। साथ ही स्फूर्तिदायक वाह्यस्थल, जैसे पीपल परिधि, जो कि एक त्रिकोणीय छत है, निरंजना आँगन, जो बुद्ध प्रतिमा का आँगन है, प्राकृतिक तत्वों को वास्तुशिल्प के साथ एकाकार कर देते हैं।

ये क्षेत्र दीर्घाऐं को विभिन्न विशिष्ट खंडों में बांटता है, बाल दीर्घा तथा इसके पूर्वावलोकन खंड को भी अलग-अलग रखा गया है। यह वास्तुशिल्प इस बात के लिए लगातार प्रयासरत है कि विस्मय तथा सम्बद्धता के भाव में अभिवृद्धि होती रहे, जिससे दर्शक खोज तथा आविष्कार करते रहें। इस तरह यह वातावरण एक ज्ञान पिरदृश्य की रचना करता है, एक ऐसा स्थान, जो शांति का भाव पैदा करता है, जो शिक्षा के अनुकूल है।

बिहार के प्रतीक के रूप में यह संग्रहालय ‘दर्शकों’ की चेतना को अपनी अद्भुत निकटता तथा निर्माण सामग्री से झकझोरता है। लोहा का भारतीय प्राचीन सभ्यताओं के साथ गहरा जुड़ाव है, जिससे यह भूमि समृद्ध है तथा माकी ने लोहे, उद्योग तथा प्रगति के बीच सांकेतिक जुड़ाव को दर्शाने के लिए आपक्षय इस्पात का इस्तेमाल किया है, जिसे कोर-टेन स्टील के रूप में भी जाना जाता है।

इस प्रकार, इस संग्रहालय का वास्तुशिल्प प्रदर्शित वस्तुओं के सुव्यवस्थित प्रस्तुतिकरण के लिए एक रचनात्मक आवरण तथा भारत के इतिहास की खोज करने के लिए एक व्यापक आधार के माध्यम से दर्शकों के मार्गदर्शक एवं प्रत्येक व्यक्ति को अधिक से अधिक प्रतीकों के साथ जोड़ने वालों की तरह कार्य करता है।

बिहार संग्रहालय के दृष्टिकोण और लक्ष्य

नये संग्रहालय का दृष्टिकोण प्राचीन इतिहास तथा अब बिहार के नाम से ज्ञात भूमि की विरासत को दिखाने वाली विश्वस्तरीय प्रदर्शन-मंजूषा बनना है। यह बिहार निवासियों तथा घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों के लिए समान रूप से एक गंतव्य स्थल होगा।

नये संग्रहालय का दृष्टिकोण इस प्राचीन काल का यशोगान करना एवं आज के आधुनिक बिहारवासियों में गर्व का अहसास भरना है।